| صبوري طرفه خاکي بر سرم کرد |
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بمو واجي صبوري کن صبوري |
| غريبي و اسيري و غم يار |
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سه درد آمو بجانم هر سه يکبار |
| غم يار و غم يار و غم يار |
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غريبي و اسيري چاره ديره |
| منم آن آتشين دل ديدگان تر |
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تويي آن شکرين لب ياسمين بر |
| گدازد آتشت بر آب شکر |
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از آن ترسم که در آغوشم آيي |
| مثال شعله خشک وتر ندونند |
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خوشا آنانکه پا از سر ندونند |
| سرائي خالي از دلبر ندونند |
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کنشت و کعبه و بتخانه و دير |
| که سر پيوسته در پاي ته ديرند |
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خوشا آنانکه سوداي ته ديرند |
| که اندر دل تمناي ته ديرند |
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بدل ديرم تمناي کساني |
| که فرزندان آدم را همه برد |
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الهي گردن گردون شود خرد |
| همه گويند فلان ابن فلان مرد |
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يکي ناگه که زنده شد فلاني |
| بکامم زهر از آن شکر دهان بي |
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دلم از سوز عشق آتش بجان بي |
| کنونم چون مگس بر سر زنان بي |
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همان دستان که با ته بي بگردن |
| هوايي غير وصلت در سرم ني |
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ته که دور از مني دل در برم ني |
| تمناي دگر جز دلبرم ني |
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بجانت دلبرا کز هر دو عالم |
| گريبان تا بدامانم بسوزد |
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دگر شو شد که مو جانم بسوزد |
| همي ترسم که ايمانم بسوزد |
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براي کفر زلفت اي پريرخ |
| زدرد و محنت آزادي مبيناد |
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دلم بي وصل ته شادي مبيناد |
| الهي هرگز آبادي مبيناد |
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خراب آباد دل بي مقدم تو |
| بنوشه جو کنارانم تويي يار |
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الاله کوهسارانم تويي يار |
| اميد روزگارانم تويي يار |
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الاله کوهساران هفتهاي بي |
| جدا از گلعذارم کردي آخر |
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فلک زار و نزارم کردي آخر |
| شش و پنجي بکارم کردي آخر |
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ميان تختهي نرد محبت |
| کجا آواره و در خانهي کيست |
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نميدانم دلم ديوانهي کيست |
| اسير نرگس مستانهي کيست |
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نميدونم دل سر گشتهي مو |
| چو آن ويران که گنجش برده باشند |
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چو آن نخلم که بارش خورده باشند |
| که رودان عزيزش مرده باشند |
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چو آن پيري همي نالم درين دشت |
| پريشان روزگارم تا کي و چند |
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پسندي خوار و زارم تا کي و چند |
| گري سربار بارم تا کي و چند |
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ته که باري ز دوشم برنگيري |
| مطيع نفس و شيطاني چه حاصل |
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دلا غافل ز سبحاني چه حاصل |
| تو قدر خود نميداني چه حاصل |
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بود قدر تو افزون از ملايک |
| مه نو زابرويت آزرم دارد |
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خور از خورشيد رويت شرم دارد |
| زبان دل بذکرت گرم دارد |
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بشهر و کوه و صحرا هر که بيني |
| سرانجامت بود جا در ته گور |
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اگر شيري اگر ببري اگر کور |
| بگردش موش و مار و عقرب و مور |
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تنت در خاک باشد سفره گستر |
| يکي عشق و دگر در دهر فرديم |
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عزيزا ما گرفتار دو درديم |
| جمالت يک نظر ناديده مرديم |
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نصيب کس مباد اين غم که ما راست |
| غم عشقت بهر کس گفتني ني |
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زدل مهر تو اي مه رفتني ني |
| ميان مردمان بنهفتني ني |
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وليکن شعله مهر و محبت |
| دلا اصلا نترسي از ته گور |
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دلا اصلا نترسي از ره دور |
| شوي بنگاه مار و لانهي مور |
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دلا اصلا نميترسي که روزي |
| حرامم بي ته بي آواز بلبل |
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حرامم بي ته بي آلاله و گل |
| کشم در پابي گلبن ساغر مل |
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حرامم بي اگر بي ته نشينم |
| بدل مهر مه روي ته ديرم |
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بسر شوق سر کوي ته ديرم |
| ته اي هر سو نظر سوي ته ديرم |
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بت من کعبهي من قبلهي من |
| شو و روزان در آزارم ازين دل |
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خدايا خسته و زارم ازين دل |
| زمو بستان که بيزارم ازين دل |
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مو از دل نالم و دل نالد از مو |
| در شادي بروي ما گشايي |
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سر راهت نشينم تا بيايي |
| که تا ويني چه سخت بيوفائي |
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شود روزي بروز مو نشيني |
| بتن توش و توانائي نمانده |
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شدستم پيرو برنائي نمانده |
| چرا چينم که بينائي نمانده |
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بمو واجي برو آلالهي چين |
| نميآيد ز مو بيمار داري |
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خدايا دل ز مو بستان بزاري |
| چرا تشنه است با اين آبداري |
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نميدونم لب لعلش به خونم |
| خيالت مونس شبهاي تارم |
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بوره اي روي تو باغ بهارم |
| بغير عشق ته کاري ندارم |
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خدا دونه که در دنياي فاني |
| بدل جز ته تمنائي نديرم |
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بسر غير ته سودائي نديرم |
| خوشا آنانکه الله يارشان بي |
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خدا دونه که در بازار عشقت |
| خوشا آنانکه دايم در نمازند |
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بحمد و قل هو الله کارشان بي |
| دلم ميل گل باغ ته ديره |
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بهشت جاودان بازارشان بي |
| بشم آلاله زاران لاله چينم |
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درون سينهام داغ ته ديره |
| به صحرا بنگرم صحرا ته وينم |
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وينم آلاله هم داغ ته ديره |
| بهر جا بنگرم کوه و در و دشت |
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به دريا بنگرم دريا ته وينم |
| غمم غم بي و همراز دلم غم |
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نشان روي زيباي ته وينم |
| غمت مهله که مو تنها نشينم |
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غمم همصحبت و همراز و همدم |
| غم و درد مو از عطار واپرس |
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مريزا بارک الله مرحبا غم |
| خلايق هر يکي صد بار پرسند |
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درازي شب از بيمار واپرس |
| دلت اي سنگدل بر ما نسوجه |
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تو که جان و دلي يکبار واپرس |
| بسوجم تا بسوجانم دلت را |
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عجب نبود اگر خارا نسوجه |
| خوشا آندل که از غم بهرهور بي |
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در آذر چوب تر تنها نسوجه |
| ته که هرگز نسوته ديلت از غم |
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بر آندل واي کز غم بيخبر بي |
| يکي درد و يکي درمان پسندد |
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کجا از سوته ديلانت خبر بي |
| من از درمان و درد و وصل و هجران |
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يک وصل و يکي هجران پسندد |
| ته که ناخواندهاي علم سماوات |
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پسندم آنچه را جانان پسندد |
| ته که سود و زيان خود نداني |
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ته که نابردهاي ره در خرابات |
| خدايا داد از اين دل داد از اين دل |
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بياران کي رسي هيهات هيهات |
| چو فردا داد خواهان داد خواهند |
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نگشتم يک زمان من شاد از اين دل |
| دلا خوبان دل خونين پسندند |
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بر آرم من دو صد فرياد از اين دل |
| متاع کفر و دين بيمشتري نيست |
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دلا خون شو که خوبان اين پسندند |
| دلا پوشم ز عشقت جامهي نيل |
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گروهي آن گروهي اين پسندند |
| دم از مهرت زنم همچون دم صبح |
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نهم داغ غمت چون لاله بر ديل |
| بي ته اشکم ز مژگان تر آيو |
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وز آن دم تا دم صور سرافيل |
| بي ته در کنج تنهائي شب و روز |
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بي ته نخل اميدم ني بر آيو |
| به والله و به بالله و به تالله |
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نشينم تا که عمرم بر سر آيو |
| که دست از دامنت من بر ندارم |
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قسم بر آيهي نصر من الله |
| دلي همچون دل نالان مو نه |
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اگر کشته شوم الحکم لله |
| اگر دريا اگر ابر بهاران |
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غمي همچون غم هجران مو نه |
| من آن مسکين تذروبي پرستم |
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حريف ديدهي گريان مو نه |
| نه کار آخرت کردم نه دنيا |
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من آن سوزنده شمع بيسرستم |
| مکن کاري که پا بر سنگت آيو |
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يکي خشکيده نخل بيبرستم |
| چو فردا نامه خوانان نامه خونند |
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جهان با اين فراخي تنگت آيو |
| غم عالم نصيب جان ما بي |
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تو ويني نامهي خود ننگت آيو |
| رسد آخر بدرمان درد هرکس |
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بدور ما فراغت کيميا بي |
| خوشا آنانکه هر شامان ته وينند |
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دل ما بي که دردش بيدوا بي |
| مو که پايم نبي کايم ته وينم |
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سخن با ته گرند با ته نشينند |
| دو زلفانت گرم تار ربابم |
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بشم آنان بوينم که ته وينند |
| ته که با مو سر ياري نداري |
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چه ميخواهي ازين حال خرابم |
| بيا يک شو منور کن اطاقم |
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چرا هر نيمه شو آيي بخوابم |
| به طاق جفت ابروي تو سوگند |
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مهل در محنت و درد فراقم |
| دو چشمم درد چشمانت بچيناد |
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که همجفت غمم تا از تو طاقم |
| شنيدم رفتي و ياري گرفتي |
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مبو روجي که چشمم ته مبيناد |
| عزيزا کاسهي چشمم سرايت |
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اگر گوشم شنيد چشمم مبيناد |
| از آن ترسم که غافل پا نهي تو |
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ميان هردو چشمم جاي پايت |
| زدست ديده و دل هر دو فرياد |
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نشنيد خار مژگانم بپايت |
| بسازم خنجري نيشش ز فولاد |
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که هر چه ديده بيند دل کند ياد |
| بيته بالين سيه مار به چشمم |
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زنم بر ديده تا دل گردد آزاد |
| بيته اي نو گل باغ اميدم |
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روج روشن شو تار به چشمم |
| بيته يارب به بستان گل مروياد |
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گلستان سربسر خار به چشمم |
| بيته هر گل به خنده لب گشايد |
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وگر رويد کسش هرگز مبوياد |
| ته که ميشي بمو چاره بياموج |
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رخش از خون دل هرگز مشوياد |
| کهي واجم که کي اين روج آيو |
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که اين تاريک شوانرا چون کرم روج |
| بيا تا دست ازين عالم بداريم |
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کهي واجم که هرگز وا نهاي روج |
| بيا تا بردباري پيشه سازيم |
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بيا تا پاي دل از گل برآريم |
| يکي برزيگرک نالان درين دشت |
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بيا تا تخم نيکوئي بکاريم |
| همي کشت و همي گفت اي دريغا |
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بخون ديدگان آلاله ميکشت |
| درخت غم بجانم کرده ريشه |
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ببايد کشت و هشت و رفت ازين دشت |
| رفيقان قدر يکديگر بدانيد |
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بدرگاه خدا نالم هميشه |
| اگر شيري اگر ميري اگر مور |
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اجل سنگست و آدم مثل شيشه |
| دلا رحمي بجان خويشتن کن |
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گذر بايد کني آخر لب گور |
| اگر دل دلبري دلبر کدامي |
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که مورانت نهند خوان و کنند سور |
| دل و دلبر بهم آميته وينم |
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وگر دلبر دلي دل را چه نامي |
| دلي نازک بسان شيشه ديرم |
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ندانم دل که و دلبر کدامي |
| سرشکم گر بود خونين عجب نيست |
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اگر آهي کشم انديشه ديرم |
| گر آن نامهربانم مهربان بي |
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مو آن نخلم که در خون ريشه ديرم |
| اگر دلبر بمو دلدار ميبو |
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چرا از ديدگانم خون روان بي |
| چرا دايم بخوابي اي دل اي دل |
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چرا در تن مرا نه دل نه جان بي |
| بوره کنجي نشين شکر خدا کن |
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ز غم در اضطرابي اي دل اي دل |
| شب تار و بيابان پرورک بي |
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که شايد کام يابي اي دل اي دل |
| گر از دستت برآيد پوست از تن |
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در اين ره روشنايي کمترک بي |
| مو از قالوا بلي تشويش ديرم |
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بيفکن تا که بارت کمترک بي |
| اگر لاتقنطوا دستم نگيرد |
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گنه از برگ و باران بيش ديرم |
| جدا از رويت اي ماه دل افروز |
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مو از ياويلنا انديش ديرم |
| وصالت گر مرا گردد ميسر |
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نه روز از شو شناسم نه شو از روز |
| نسيمي کز بن آن کاکل آيو |
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همه روزم شود چون عيد نوروز |
| چو شو گيرم خيالش را در آغوش |
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مرا خوشتر ز بوي سنبل آيو |
| مو کز سوته دلانم چون ننالم |
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سحر از بسترم بوي گل آيو |
| بگل بلبل نشيند زار نالد |
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مو کز بي حاصلانم چون ننالم |
| چه خوش بي وصلت اي مه امشبک بي |
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مو که دور از گلانم چون ننالم |
| زمهرت اي مه شيرين چالاک |
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مرا وصل تو آرام دلک بي |
| مسلسل زلف بر رخ ريته ديري |
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مدامم دست حسرت بر سرک بي |
| پريشان چون کري زلف دو تا را |
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گل و سنبل بهم آميته ديري |
| اگر مستان هستيم از ته ايمان |
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بهر تاري دلي آويته ديري |
| اگر گبريم و ترسا ور مسلمان |
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وگر بي پا و دستيم از ته ايمان |
| اگر آئي بجانت وانواجم |
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بهر ملت که هستيم از ته ايمان |
| ته هر دردي که داري بر دلم نه |
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وگر نائي به هجرانت گداجم |
| عاشق آن به که دايم در بلا بي |
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بميرم يا بسوجم يا بساجم |
| حسن آسا بدستش کاسهي زهر |
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ايوب آسا به کرمان مبتلا بي |
| نواي ناله غم اندوته ذونه |
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حسين آسا بدشت کربلا بي |
| بيا سوته دلان با هم بناليم |
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عيار قلب و خالص بوته ذونه |
| مو آن بحرم که در ظرف آمدستم |
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که قدر سوته دل دل سوته ذونه |
| بهر الفي الف قدي بر آيو |
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چو نقطه بر سر حرف آمدستم |
| دلم از دست خوبان گيج و ويجه |
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الف قدم که در الف آمدستم |
| دل عاشق مثال چوبتر بي |
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مژه بر هم زنم خونابه ريجه |
| ز کشت خاطرم جز غم نروئي |
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سري سوجه سري خونابه ريجه |
| ز صحراي دل بيحاصل مو |
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ز باغم جز گل ماتم نروئي |
| سيه بختم که بختم واژگون بي |
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گياه نااميدي هم نروئي |
| شدم آوارهي کوي محبت |
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سيه روجم که روجم سرنگون بي |
| بيته يک شو دلم بي غم نميبو |
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زدست دل که يارب غرق خون بي |
| هزاران رحمت حق باد بر غم |
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که آن دلبر دمي همدم نميبو |
| مو ام آن آذرين مرغي که فيالحال |
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زماني از دل ما کم نمي بو |
| مصور گر کشد نقشم به گلشن |
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بسوجم عالم ار برهم زنم بال |
| ز عشقت آتشي در بوته ديرم |
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بسوجه گلشن از تاثير تمثال |
| سگت ار پا نهد بر چشم اي دوست |
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در آن آتش دل و جان سوته ديرم |
| بدرياي غمت دل غوطهور بي |
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بمژگان خاک راهش رو ته ديرم |
| ز مژگان خدنگت خوردهام تير |
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مرا داغ فراقت بر جگر بي |
| مدامم دل براه و ديده تر بي |
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که هر دم سوج دل زان بيشتر بي |
| ببويت زندگي يابم پس از مرگ |
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شراب عيشم از خون جگر بي |
| گلي کشتم باين الوند دامان |
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ترا گر بر سر خاکم گذر بي |
| چو روج آيو که بويش وا من آيو |
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آوش از ديده دادم صبح و شامان |
| دو چشمانت پيالهي پر ز مي بي |
|
برد بادش سر و سامان بسامان |
| همي وعده کري امروز و فردا |
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خراج ابروانت ملک ري بي |
| قدم دايم ز بار غصه خم بي |
|
نميدانم که فرداي تو کي بي |
| مو هرگز از غم آزادي نديرم |
|
چو مو محنت کشي در دهر کم بي |
| بشم واشم ازين عالم بدر شم |
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دل بي طالع مو کوه غم بي |
| بشم از حاجيان حج بپرسم |
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بشم از چين و ما چين دورتر شم |
| صداي چاوشان مردن آيو |
|
که اين دوري بسه يا دورتر شم |
| رفيقان ميروند نوبت به نوبت |
|
بگوش آوازهي جان کندن آيو |
| به قبرستان گذر کردم کم وبيش |
|
واي آن ساعت که نوبت وامن آيو |
| نه درويش بيکفن در خاک رفته |
|
بديدم قبر دولتمند و درويش |
| ديم يک عندليب خوشنوائي |
|
نه دولتمند برده يک کفن بيش |
| اگر خود پادشاهي عاقبت هيچ |
|
اگر زرين کلاهي عاقبت هيچ |
| در آخر خاک راهي عاقبت هيچ |
|
اگر ملک سليمانت ببخشند |
| همائي کي به هر بوم و بر آيو |
|
غم عشق تو کي بر هر سر آيو |
| که خور اول به کهساران بر آيو |
|
زعشقت سرفرازان کاميابند |
| ته که يارم نهاي پيشم چرايي |
|
ته که نوشم نهاي نيشم چرايي |
| نمک پاش دل ريشم چرايي |
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ته که مرهم نهاي بر داغ ريشم |
| اگر رويت بوينم غم نماني |
|
بيته يکدم دلم خرم نماني |
| دلي بي غم درين عالم نماني |
|
اگر درد دلم قسمت نمايند |
| بگو اي بيوفا اي بيمروت |
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اگر يار مرا ديدي به خلوت |
| نخواهم دوخت تا روز قيامت |
|
گريبانم ز دستت چاک چاکو |
| بخون ريزي دلش اصلا نگفت اف |
|
فلک نه همسري دارد نه هم کف |
| چراغ دودمانيرا کند پف |
|
هميشه شيوهي کارش همينه |
| گلم گر نيستي خارم چرائي |
|
فلک در قصد آزارم چرائي |
| ميان بار سربارم چرايي |
|
ته که باري ز دوشم بر نداري |
| خيال خط و خالت در نشي يار |
|
زدل نقش جمالت در نشي يار |
| که تا وينم خيالت در نشي يار |
|
مژه سازم بدور ديده پرچين |
| خمارين نرگسان پرخواب مکه |
|
پريشان سنبلان پرتاب مکه |
| برنيه روزگار اشتاب مکه |
|
برايني ته که دل از مابريني |
| سبک دستي بزد بر بال من تير |
|
جره بازي بدم رفتم به نخجير |
| هران غافل چرد غافل خورد تير |
|
برو غافل مچر در کوهساران |
| نه خان ديرم نه مان ديرم نه لنگر |
|
مو آن رندم که نامم بيقلندر |
| چو شو آيو به خشتي وانهم سر |
|
چو روج آيو بگردم گرد گيتي |
| پريشانم پريشان آفريدند |
|
مرا نه سر نه سامان آفريدند |
| مرا از خاک ايشان آفريدند |
|
پريشان خاطران رفتند در خاک |
| چو ني از استخوانم نالش آيو |
|
بي ته هر شو سرم بر بالش آيو |
| ز مژگان پارههاي آتش آيو |
|
شب هجران بجاي اشک چشمم |
| جهازم چوب و خرواري ببارم |
|
مو که چون اشتران قانع به خارم |
| هنوز از روي مالک شرمسارم |
|
بدين مزد قليل و رنج بسيار |
| دلم از عهد و پيمان بر نگرده |
|
سرم چون گوي در ميدان بگرده |
| نشينم تا که اين دوران بگرده |
|
اگر دوران به نااهلان بمانه |
| ببالين خشتي و بستر زمينه |
|
دلم از دست تو دايم غمينه |
| که هر کت دوست ديره حالش اينه |
|
همين جرمم که مو ته دوست ديرم |
| همه فکر و خيالي اي دل اي دل |
|
چرا آزرده حالي اي دل اي دل |
| بوينم تا چه حالي اي دل اي دل |
|
بساجم خنجري دل را برآرم |
| بمو دايم به جنگي اي دل اي دل |
|
مگر شير و پلنگي اي دل اي دل |
| بوينم تا چه رنگي اي دل اي دل |
|
اگر دستم فتي خونت بريجم |
| قدح از دست مو افتاد و نشکست |
|
شب تاريک و سنگستان و مو مست |
| وگرنه صد قدح نفتاده بشکست |
|
نگهدارندهاش نيکو نگهداشت |
| براني گر بخواري از که ترسي |
|
کشيمان ار بزاري از که ترسي |
| دو عالم دل ته داري از که ترسي |
|
مو با اين نيمه دل از کس نترسم |
| سراپايي بجز دلبر ندونم |
|
مو آن رندم که پا از سر ندونم |
| بغير از ساقي کوثر ندونم |
|
دلارامي کز او دل گيرد آرام |
| زپيکر مشت خاکستر برآره |
|
مرا عشقت ز جان آذر برآره |
| هزاران شاخه ديگر برآره |
|
نهال مهرت از دل گر ببرند |
| دل با غم خوشي ديرم خدايا |
|
تن محنت کشي ديرم خدايا |
| به سينه آتشي ديرم خدايا |
|
زشوق مسکن و داد غريبي |
| بود وصل مو و هجرانم از دوست |
|
بود درد مو و درمانم از دوست |
| جدا هرگز نگردد جانم از دوست |
|
اگر قصابم از تن واکره پوست |
| خرم آنانکه اين آلاليان کشت |
|
خرم کوه و خرم صحرا خرم دشت |
| همان کوه و همان صحرا همان دشت |
|
بسي هند و بسي شند و بسي يند |
| فراقت مرغ بيبال و پرم کرد |
|
غم عشقت بيابان پرورم کرد |
| بشاخ گلبني با گل همي گفت |
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که ميناليد وقت صبحگاهي |
| به قبرستان گذر کردم صباحي |
|
که يارا بي وفايي بي وفائي |
| شنيدم کلهاي با خاک ميگفت |
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شنيدم ناله و افغان و آهي |
| هر آنکس مال و جاهش بيشتر بي |
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که اين دنيا نميارزد بکاهي |
| اگر بر سر نهي چون خسروان تاج |
|
دلش از درد دنيا ريشتر بي |
| هر آنکس عاشق است از جان نترسد |
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به شيرين جانت آخر نيشتر بي |
| دل عاشق بود گرگ گرسنه |
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يقين از بند و از زندان نترسد |
| هزاران دل بغارت برده ويشه |
|
که گرگ از هي هي چوپان نترسد |
| هزاران داغ ريش ار ويشم اشمرد |
|
هزارانت دگر خون کرده ويشه |
| هزاران داغ ريش ار ويشم اشمرد |
|
هنو نشمرده از اشمرده ويشه |
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